मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

आज का भारत देश


महगांई दिन रात बढ़ती हैं मेरे देश में
संचालक सोये रहते हैं सफेद ड्रेस में
     हर इंसान जीना चाहता है,
    छल कपट और द्वेष में ।
    भ्रष्टाचारी मिलता हैं,
      हर रंग के भेष में।
शैतान घूमते रहते साधुओं की ड्रेस में
      फिर भी कानून चुप है,
      लाचारी के इस देश में
     इंसानियत बस चंद सांसे
     गिन रही इस परिवेश में।
     मूल्य नीति, संस्कार
     पहले ही दम तोड़ चुके
     पश्चिम के आगोश में
     कितना मुश्किल है
     लेकिन सच है ये कहना
    आज भी चुप्पी साधे हुए है
     लोग मेरे देश में।
                                   अर्चना
                                   बी.ए.३

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

सकारात्मक सोच - सफ़लता का मार्ग

'सकारात्मक सोच- सफलता का मार्ग'

साथियों,
सकारात्मक सोच सफलता की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। जब भी आपके सामने कोई लक्ष्य है और आप सफलता के ऊँचे शिखर को छूने का प्रयास कर रहे हो तो आपके पास सबसे जरूरी हो और महत्वपूर्ण शस्त्र होना चाहिए- `सकारात्मक सोच`|  सकारात्मक सोच अर्थात  अंधेरे में भी राह बनाने की कला, दुःख को भी सुख में बदल देने का गुर।

सकारात्मक सोच के साथ ही आत्मविश्वास का होना सफलता को दोगुना कर देता है। सकारात्मक सोच वह ताकत है,जो असंभव को भी संभव में बदल देती है।
शोधकर्ता बताते हैं कि हमारे दिमाग में हर दिन साठ हजार विचार आते हैं,पर साठ हजार विचारों में से अधिकांश विचार नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। इनमें सकारात्मक विचारों की संख्या कम होती है । जब हम सकारात्मक सोच रहे होते हैं तब हम सफलता की ओर बढ़ रहे होते हैं, जब हम नकारात्मक सोच रहे होते हैं तब हम नाकामी की ओर बढ़ रहे होते हैं।

हमारा मानव-मस्तिष्क भूमि के टुकड़े के समान है। जिस प्रकार भूमि को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इसमें क्या बोया जा रहा है उसी प्रकार मानव-मस्तिष्क को भी इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि उसमें किस प्रकार के विचार बोये जा रहे हैं? यदि हम सकारात्मक विचारों की खेती करते हैं तो सफलता की फसल काटते हैं और यदि हम नकारात्मक विचारों की खेती करते हैं तो हम नाकामी की फसल काटते हैं ।
साथियों, जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ व संघर्ष क्यों ना आएं, सकारात्मक सोच बनाए रखें क्योंकि सकारात्मकता हमेशा ही सफलता की ओर अग्रसर करती है
    यदि आप नकारात्मक सोचते हैं,
    तो परिणाम नकारात्मक आएंगे ।
    यदि आप सकारात्मक सोचते हैं,
    तो परिणाम सकारात्मक ही होंगे।।

स्वामी विवेकानंद ठीक ही कहा है -

   अपने जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित करो।
   अपने पूरे शरीर को एक लक्ष्य से भर दो,
   और हर दूसरे विचार को अपनी जिंदगी से निकाल दो ,
   क्योंकि यहीं सफलता की कुँजी है।

  ~ नोट- मेरे द्वारा लिखित यह लेख 'सकारात्मक सोच-सफलता का मार्ग'  परिष्कार कॉलेज द्वारा प्रकाशित अगस्त माह की  परिष्कार स्पंदन में प्रकाशित हो चुका है ।

      ~  सुरेश कुमार पटेल 'जिज्ञासु'
            बी. ए. तृतीय वर्ष
     परिष्कार कॉलेज ऑफ़ ग्लोबल एक्सीलेंस, जयपुर

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

आत्महत्या


आत्महत्या,
एक ऎसा हथियार या यूँ कहो कि रामबाण औषधि किसी मुसीबत से बचने का, खुद को निकाल कर अपने परिवारजन को दुःख देने का या फिर वास्तविकता कहूँ तो हिम्मत हार जाना।

एक सभ्य परिवार में रहते हुए, एक प्रगतिशील राष्ट्र के कर्तव्यनिष्ठ नागरिक होकर जो कि इस राष्ट्र को प्रगतिशील बनाने मे अहम भागीदारी निभा रहा है, एक ऎसा राष्ट्र जो हज़ारों परेशानियों से जूझ रहा है। किंतु फिर भी एक घायल जवान की भांति सीमा पर इसी उम्मीद में खड़ा हुआ है कि कभी ना कभी तो उसकी प्रजा बदलेगी, परंतु इस घायल जवान रूपी राष्ट्र को मिलता क्या है? सिर्फ "निराशा".... वो भी आत्महत्या के रूप में, बलात्कार के रूप में, भ्रष्टाचार के रूप में,अमानवता के रूप में.... न जाने कितने ही अनेको रूप है इस निराशा के। परंतु सभी समस्या को एक किनारे कर मैं बात करू "आत्महत्या " की तो आंकड़े आपको अंदर तक झकझोर देने वाले हैं। जी वास्तव में यही हाल है भारतीय सभ्य समाज का, एक ऎसे समाज का जिसे युवाओं का समाज कहा जा सकता है। लेकिन क्या इस सभ्य समाज का युवा इतना कमजोर है? या फिर इस युवा में सिर्फ निराशा भरी हुई है?

क्योंकि प्रत्येक छोर पर निराशा का अनंत समुद्र दीख पड़ता है।
और सवाल है क्यों.......? ये निराशा क्यों है, क्या समाज खुद अपने युवाओं में ये निराशावादी विचारधारा उत्पन्न कर रहा है? परंतु जहां तक मेरा मानना है तो ये युवा ही तो समाज है, तो क्यों युवा खुद से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है?
क्या अब कोई उपाय दिखाई देता है इसका.......?
जी, जरूर! उपाय है, और वो मै हूँ, आप स्वयं है, आपका परिवार है और सबसे महत्वपूर्ण आपके और आपके परिवार के विचार है।
नहीं, नहीं मै आपको जागरूक नहीं कर रहा हूँ, बिल्कुल भी नहीं।
मैं तो सिर्फ एक बच्चा हूँ, जो खुद दुखी है इस "जागरूकता" से।
क्या वो 35 साल की महिला जागरूक नहीं थी जो IRS जैसे पद पर अधीनस्थ थी?
नहीं, नहीं मै समझदारी की भी बात नहीं कर रहा हूँ। अरे! मै तो सिर्फ एक बच्चा हूँ...... जो दुखी है ऎसी "समझदारी" से
परंतु क्या वो IAS अधिकारी भी समझदार नहीं था, जिसने ये कदम उठाने के लिए मजबूर किया।
विडम्बना देखिए जनाब इस समाज  कि जब "जागरूकता" और "समझदारी" का मिलन होता है तो उत्पन्न होती है, "आत्महत्या"।

इतनी असभ्यता इस सभ्य कथित समाज में, जिसकी महानता के नारे लगाये जाते रहे है।
परंतु विचार करने वाली बात यह है कि आज की युवा सभ्यता आने वाली युवा सभ्यता के लिए किस प्रकार का इतिहास छोड़ कर जाएगी ?   क्या असर होगा आने वाले युवाओं पर जो अपने जीवन के प्रारंभिक सफर में इन घटनाओं से सामना करने पर मज़बूर है।
इसलिए आवश्यक है कि जो जागरूकता और समझदारी आपके अंदर दबी पड़ी है उसे अमल में लाया जाये, साझा किया जाये, इसका सही उपयोग एवं सही तरीका समझाया जाये। ताकि जब इनका मिलन हो तो आत्महत्या नहीं बल्कि "आत्म सुरक्षा" उत्पन्न हो सके।
क्योंकि इस "आत्म सुरक्षा" से ना सिर्फ आपका अपितु आपके परिवार का, आपके समाज का आने वाली युवा पीढ़ी का भी भला हो सकेगा और शायद उस घायल जवान के घावों पर भी मल्हम लग जाये जो खड़ा हुआ है सीमा पर अपनी प्रजा के बदलने के इंतज़ार में..... याद तो है ना आपको!

एक चिन्तनशील एवं विचारणीय भावना.....

         ~  तुषार स्वर्णकार
       ~ बी.ए. प्रथम वर्ष
     परिष्कार कॉलेज ऑफ़ ग्लोबल एक्सीलेंस, जयपुर

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

स्वच्छ भारत अभियान बापू के 'स्वच्छ भारत' के सपने को पंख दे रहा है

देश इस वर्ष महात्मा गांधी की जन्मशती मना रहा है। इस साल प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के फ्लैगशिप स्वच्छता अभियान-स्वच्छ भारत अभियान के तीन वर्ष पूरे हो रहे हैं। सरकार के लिए यह सर्वेक्षण का समय है। मोदी सरकार ने महात्मा गांधी की 150वीं जन्मशती के अवसर पर दो अक्टूबर, 2019 तक खुले में शौच से मुक्त भारत का महत्वकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। तीन वर्ष की लघु अवधि में इस दिशा में सफलता दिखने लगी है। सरकार को 2019 तक हर घर में शौचालय उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूरा करना है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत दो अक्टूबर 2014 तक 4.90 करोड़ शौचालय बन चुके थे। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार 24 सितंबर 2017 तक 2.44 लाख गांव और 203 जिले खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिए गए हैं। इस कार्यक्रम की विशेषता यह है कि बहुत से सार्वजनिक क्षेत्रों के साथ-साथ निजी संस्थानों ने भी सरकार की इस अहम योजना में मिलकर काम किया है और इसे सफल बनाया है। कई औद्योगिक घरानों ने कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत कई गांवों को गोद लिया है और वहां शौचालय बनाने की जिम्मेदारी ली है। 2012 में केवल 38 प्रतिशत क्षेत्र स्वच्छता कवरेज से जुड़े थे। अब यह बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया है। लेकिन अब भी बहुत कुछ करना बाकी है।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक पखवाड़े के लिए स्वच्छता ही सेवा “क्लीनलिनेस इज सर्विस” अभियान आरंभ किया है। इसका समापन गांधी जयंती पर अगले महीने होगा। इस अभियान के तहत देश भर में स्वच्छता मुहिम को प्रोत्साहित करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए हैं। इसका उद्देश्य तीन वर्ष पहले राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में आरंभ किए गए स्वच्छ भारत अभियान को बल देना है। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय इस अभियान का प्रचार प्रसार कर रहा है। इसके साथ इस अभियान में अन्य मंत्रालय, सरकारी विभाग, गैर-सरकारी संगठन भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के कार्य में जुटे हैं।

दो अक्टूबर 2014 इतिहास की पुस्तकों में स्वच्छ भारत अभियान के रूप में दर्ज होगा। इस दिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली में स्वच्छता के लिए खुद झाडू लगाई थी। प्रधानमंत्री ने स्वच्छता का बिगुल बजाया और लोगों ने इस महत्ती कार्य में उनका साथ दिया, क्योंकि यही महात्मा गांधी के लिए सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि है। महात्मा गांधी एक शती पूर्व ही भारत के लिए स्वच्छता को पहली प्राथमिकता देना चाहते थे। इस अभियान का उद्देश्य स्वच्छता के अन्य लक्ष्यों के साथ खुले में शौच की आदत को समाप्त करना है और अधिक शौचालयों का निर्माण एवं कूड़े-कचरे के प्रबंधन में सुधार लाना है।

स्वच्छता के महत्व पर बल देते हुए प्रधानमंत्री ने कई बार कहा है कि स्वच्छ भारत के विचार का राजनीति से कोई लेनादेना नहीं है। यह देश भक्ति से प्रेरित है। हमें स्मरण होना चाहिए कि गांधी जी ने कहा था कि स्वच्छता, स्वाधीनता से अधिक महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपनी स्वच्छता खुद करने को कहा था। वे चाहते थे कि हम अपनी सफाई स्वयं करें और छूआछूत की इस घृणित परिपाटी को समाप्त कर दें। यह आंदोलन स्वाधीनता के बाद धीमा पड़ गया। हालांकि विभिन्न सरकारों ने इस दिशा में कई कार्यक्रम चलाए, लेकिन यह दुखद है कि स्वच्छता और अस्पर्शता दोनों विषय बापू के निधन के लगभग 70 साल बाद भी देश में विद्यमान हैं। अपर्याप्त स्वच्छता स्वास्थ्य संबंधी कई बीमारियों और असमय मृत्यु का कारण बनती है। एक स्वयंसेवी संगठन वॉटर ऐड ने 2014 की अपनी एक रिपोर्ट में इस गंभीर स्थिति के बारे में जिक्र किया था। इसने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारत में 1.2 बिलियन लोगों में से एक तिहाई से कम लोगों की पहुंच स्वच्छता तक है। पांच साल की उम्र तक के 1,86,000 से भी अधिक बच्चे हर साल असुरक्षित जल और दयनीय स्वच्छता सेवाओं के वजह से डायरिया रोगों के कारण मौत के मुंह में समा जाते हैं। इससे भारत की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। अनुमान लगाया गया है कि देश में हर साल स्वच्छता की दयनीय स्थिति के कारण बीमारियों और असमय मृत्यु से देश अपनी जीडीपी का 6.4 प्रतिशत खो देता है। अब स्थिति बदल रही है और विभिन्न सरकारी एजेंसियां स्वच्छता की चुनौती का सामना करने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य कर रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा है कि पूर्व में स्वच्छता और निजी स्वच्छता की कमी के कारण भारत में अनुमानतः प्रति व्यक्ति साढ़े छह हजार रुपये बर्बाद होते हैं। उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान जन-स्वास्थ्य पर अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ेगा। इससे निर्धनों की आय की बचत होगी और अंततः राष्ट्र की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। उन्होंने कहा कि स्वच्छता को राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे राष्ट्रभक्ति और जन-स्वास्थ्य की प्रतिबद्धता से जोड़ा जाना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने एक सर्वेक्षण किया है, जिसमें स्वच्छ भारत मिशन के लाभों के बारे में एक अनुमान लगाया गया है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वच्छता के सुधार के कार्य में निवेश किये गये एक रुपया से साढ़े चार रुपये की बचत होगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि खुले में शौच से मुक्त समाज का निर्माण होता है तो चिकित्सा खर्च कम होगा, समय की बचत होगी और जलजनित रोगों से होने वाली मृत्यु दर को रोका जा सकेगा, जिससे प्रति वर्ष हर घर में लगभग 50,000 रुपये की बचत हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इससे निर्धनतम लोगों को सर्वाधिक फायदे होंगे।

लेकिन इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए स्थानीय निकायों और राज्य सरकारों को दोगुने प्रयत्न करने होंगे और जागरूकता के प्रसार तथा निजी स्वच्छता और शुद्धता के बारे में लोगों के पुरातन दृष्टिकोण को बदलना होगा। सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद कई स्थानों पर बड़ी संख्या में आज भी लोगों का मिथक है कि घर में शौचालय का इस्तेमाल करना उस स्थान को अशुद्ध करना है। सरकार और औद्योगिक घराने शौचालय का निर्माण करवा सकते हैं, लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि लोगों को खुले स्थानों में शौच के नुकसान के प्रति जागरूक करके शौचालयों की परिधि में लाया जाए। उन्हें स्वच्छता के स्वास्थ्य संबंधी और आर्थिक लाभों के बारे में जानकारी दी जाए और यह एहसास दिलाया जाए कि स्वच्छता उनके लिए कितनी आवश्यक है। इस कार्यक्रम की सफलता जनभागीदारी पर निर्भर है। इसलिए यह अत्यावश्यक है कि लोग स्वच्छ और स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए जागृत हों।

                    सुरेश कुमार पटेल
                           सचिव
             राजनीति विज्ञान विषय परिषद
परिष्कार कॉलेज ऑफ ग्लोबल एक्सीलेंस ,जयपुर

बुधवार, 15 नवंबर 2017

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उदय एवं उसके कारण

राष्ट्रीय आंदोलन का उदय एवं उसके कारण

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उदय 19 वीं शताब्दी की एक प्रमुख घटना थी मैकडोनाल्ड के शब्दों में, ‘‘ भारतीय राष्ट्रवाद राजनीतिक मण्डलों का नहीं अपितु इससे बहुत कुछ अधिक रहा है। यह एक ऐतिहासिक परम्परा का पुनरूज्जीवन है, एक राष्ट्र की आत्मा की मुक्ति है।‘‘ भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के उदय के पीछे एक नहीं अपितु अनेक कारण रहे जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-

1. 1857 का स्वतंत्रता संग्राम:- 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। उसे अधिकांश ब्रिटिश लेखकों ने सैनिक विद्रोह की संज्ञा दी है जो उचित नहीं है। यह सैनिक विद्रोह नहीं बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु भारतीयों का प्रथम जन-विद्रोह था। इस आंदोलन को दबाने के लिये अंग्रेजों ने अत्यधिक अमानवीयता से काम किया जिसका वर्णन करते हुये सर चाल्र्स डिस्के ने अपनी पुस्तक ग्रेटर इंडिया में लिखा है-
‘‘ अंग्रेजों ने अपने कैदियों की हत्या बिना न्यायिक कार्यवाही के इस ढंग से कर दी जो सभी भारतीयों की दृष्टि में पाश्विकता की चरम सीमा थी..........दमन के दौरान गाँव जला दिये गये। निर्दोष ग्रामीणों का वह कत्ले आम किया गया कि उससे मुहम्मद तुगलक भी शरमा जायेगा ।“ यह सत्य है कि योग्य नेतृत्व का अभाव, संचार एवं सैन्य व्यवस्था की कमी, तालमेल का अभाव जैसी कमियों के कारण यह आंदोलन सफल भले ही न हो पाया हो पर आंदोलन को दबाने में अंग्रेजों ने जिस अमानवीयता का परिचय दिया उससे भारतीय जनता भयभीत होने के स्थान पर स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु और अधिक कटिबद्ध हो गयी।
2. पश्चात शिक्षा का प्रभाव:- पश्चात शिक्षा से भी भारतीय राष्ट्रवाद को बल मिला क्योंकि शिक्षित होने के पश्चात भारतीयों को अन्य देशों के नागरिकों की तुलना में अपनी दीनता-हीनता का आभास हुआ और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इसका प्रमुख कारण है विदेशियों का उनके ऊपर शासन। यद्यपि लार्ड मैकाले ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा को लागू करवाने हेतु इसलिये बल दिया ताकि उसे शासन व्यवस्था में कम वेतन पर क्लर्क प्राप्त हो सकें। अर्थात् ऐसे व्यक्ति जो खून और वर्ण से तो भारतीय हो किंतु रूचि, विचार,शब्द और बुद्धि से अंग्रेज हों। 
मैकाले इस बात से भी भली भाँति परिचित था कि अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भारतीय ब्रिटिश लोकतांत्रिक शासन पद्धति की माँग करेंगे। इसीलिए उसने 1833 में कहा था-‘‘ अंग्रेजी इतिहास में वह गर्व का दिन होगा जब पश्चात ज्ञान में शिक्षित होकर भारतीय पश्चात संस्थानों की माँग करेंगे।’’ इस अंग्रेजी शिक्षा का भारतीयों पर मिला जुला प्रभाव हुआ। यह प्रभाव बुरा इस अर्थ में था कि अनेक भारतीय अपनी सभ्यता, संस्कृति, भाषा रीति-रिवाज और परम्पराओं को भूलकर अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति का गुणगान करने लगे इसके विपरीत भारतीयों को इस शिक्षा व्यवस्था से अनेक-नेक लाभ हुए। अंग्रेजी के प्रचार प्रसार से भारत के बाहर बसे लोगों के बीच भाषा की एकता स्थापित हो गयी इसके अतिरिक्त उन्हें मिल, मिल्टन तथा बर्क जैसे महान व्यक्तियों के विचारों का ज्ञान हुआ। उनमें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत हुई। इसे अपने लिए वे आवश्यक मानने लगे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव की चर्चा करते हुए ए.आर.देसाई ने लिखा है ‘‘ शिक्षित भारतीयों ने अमरीका, इटली और आयरलैण्ड के स्वतंत्रता संग्रामों के संबंध में पढ़ा। उन्होंने ऐसे लेखकों की रचनाओं का अनुशीलन किया जिन्होंने व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्वाधीनता के सिद्धान्तों का प्रचार किया है। ये शिक्षित भारतीय भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक और बौद्धिक नेता हो गये।

पश्चात शिक्षा का स्पष्ट प्रभाव 1885 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में दृष्टिगोचर हुआ जहाँ अंग्रेजी भाषा के द्वारा ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने एक दूसरे के विचारों को समझा। राजा राममोहन राय, गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी, व्योमेश चन्द्र वनर्जी आदि इस अंगे्रजी शिक्षा की ही देन थे। इन्होंने देश को स्वतंत्र कराने में महती भूमिका अदा की । अंग्र्रेजी शिक्षा प्राप्ति के पश्चात जब भारतीय ब्रिटेन एवं अन्य देशों के भ्रमण पर गये तो वहाँ की व्यवस्था देखकर अवाक रह गये। तत्पश्चात उन्होंने अपने लिए भी स्वशासन की माँग की। इस दृष्टि से डॉ. जकारिया का यह कथन सत्य है कि ‘‘अंग्रेजों ने 125 वर्ष पूर्व शिक्षा का जो कार्य आरम्भ किया उससे अधिक हितकर और कोई कार्य उन्होंने भारत वर्ष में नहीं किया।’’

3. राजनीतिक एकता:- भारत प्राचीन एवं मध्यकाल में सांस्कृतिक दृष्टि से एक था पर यह एकता सर्वथा अस्थिर थी अशोक, समुद्र गुप्त, अकबर एवं औरंगज़ेब ने भारत के एक बड़े भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया पर वे उसे स्थिर नहीं रख सके। प्रो. विपिन चन्द्र ने इसे स्वीकार करते हुये अपनी पुस्तक‘‘ भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’’ में लिखा है। ‘‘........दादा भाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी और तिलक से लेकर गाँधीजी और जवाहर लाल नेहरू तक राष्ट्रीय नेताओं ने स्वीकार किया कि भारत पूरी तरह से सुसंगठित राष्ट्र नहीं है। यह एक ऐसा राष्ट्र है जो बनने की प्रक्रिया में है।“ भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करने में अंग्रेज बड़े सहायक सिद्ध हुए। अंग्रेजों ने भारत में शासन की एकता स्थापित करके उसे एक राजनीतिक इकाई का रूप दिया।

यातायात के साधनों के विकास के फलस्वरूप देश के विभिन्न कोनों के लोग सुविधा पूर्वक एक दूसरे के संपर्क में आए जिससे उनकी स्थानीय भक्ति का स्थान राष्ट्रीय भक्ति ने ले लिया। हालांकि अंग्रेजों ने भारत में यातायात का विकास अत्यधिक आर्थिक दोहन एवं सेना के सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से किया था पर जैसा कि जवाहर लाल नेहरू का कथन है ‘‘ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित भारत की राजनीतिक एकता सामान्य एकता की अधीनता थी लेकिन उसने सामान्य राष्ट्रीयता की एकता को जन्म दिया’’8 इस प्रकार एकता की भावना ने राष्ट्रीयता के विकास की भावना का मार्ग प्रशस्त किया।

4. सामाजिक एवं धार्मिक आंदोलन:-राष्ट्रीय भावना की उत्पत्ति में 19 वीं शताब्दी के सामाजिक एवं धार्मिक आंदोलनों का मुख्य स्थान है। राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज, स्वामी दयानंद सरस्वती एवं आर्य समाज, स्वामी विवेकानन्द एवं रामकृष्ण मिशन, श्रीमती एनी बेसेन्ट एवं थियोसोफिकल सोसाइटी ने अपने विचारों एवं आंदोलनों के माध्यम से भारतीय जनता को यह सन्देश दिया कि उनका धर्म एवं संस्कृति श्रेष्ठ है। इन विचारों ने भारतीयों को उनके धर्म एवं समाज में व्याप्त दोषों और कुरीतियों के प्रति आगाह किया। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज में व्याप्त सती-प्रथा, विधवा-विवाह तथा बाल-विवाह जैसी कुरीतियों के विरूद्ध जनमत तैयार हुआ, जिससे इन पर रोक लग सकी। इन सुधार आंदोलनों के परिणाम स्वरूप सामाजिक कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों का विनाश होने से भारतीयों में नव जागरण का सूत्र पात हुआ और नवोत्साह से वे देश की स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रयास करने लगे।

5. शिक्षित भारतीयों में असंतोष:- पश्चात शिक्षा के फलस्वरूप भारतीयों में एक नवीन शिक्षित वर्ग का उदय हुआ जो शासन व्यवस्था में भागीदार बनने हेतु उद्यत था। परन्तु 1833 के अधिनियम एवं 1850 के ब्रिटिश सम्राज्ञी की इस स्पष्ट घोषणा के बावजूद कि भारतीयों को वर्ण, जाति, भाषा या धर्म आदि के आधार पर कोई पद प्रदान करने से वंचित नहीं किया जायेगा, शिक्षित भारतीयो को उच्च पदों से दूर रखने की हर संभव कोशिश की जाती रही। इससे शिक्षित भारतीय असंतुष्ट हो गये। 
      अंग्रेजों की इस कथनी और करनी का अंतर अनेक भारतीयों को प्रतिष्ठित ‘भारतीय नागरिक सेवा ञ परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात उन्हें सेवा का अवसर न देना या किसी छोटी सी गलती के फलस्वरूप उन्हें नौकरी के लिए अयोग्य घोषित कर देना ऐसी ही घटनाएँ थी। अरविन्द घोष को परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात घुड़सवारी में प्रवीण न होने का आरोप लगाकर नौकरी से वंचित कर दिया गया। जब 1877 में इसी प्रतियोगी परीक्षा हेतु परीक्षार्थियों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 कर दी गई तो शिक्षित भारतीय नवयुवकों में अत्यधिक अंसतोष फैला क्योंकि योग्यता रखते हुये भी उन्हें उच्च पदों से वंचित रखने की यह एक चाल थी। ब्रिटिश शासन के इस अवांछनीय कदम से भारतीय नवयुवक राष्ट्रीय आन्दोलन हेतु कटिबद्ध हो गये। ब्रिटिश शासन के इस कदम का विरोध करने के लिये सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने भारत का दौरा किया और जनता को इन अन्यायों का विरोध करने के लिये प्रेरित किया। भारत की इन शिकायतों को ब्रिटिश सरकार के समक्ष रखने हेतु लाल मोहन घोष को इंग्लैण्ड भेजा गया। इस प्रकार इस आंदोलन ने राष्ट्रीय जाग्रति फैलाने में अपना योगदान दिया।

6.  भारत का आर्थिक शोषण:- अंग्रेज भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आये थे और यहाँ के शासकों की कमजोरी का फायदा उठाकर वे राजनीतिक क्षेत्र में भी सर्वेसर्वा बन गये। राजनैतिक क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित होने से उन्हें भारत का आर्थिक शोषण करने में भी सरलता हुई। अंग्रेजों के इस आर्थिक शोषण से भारत के उद्योगों एवं कृषि का नाश तो हुआ ही साथ ही व्यापार पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा। बर
     प्रतिबन्धों के बावजूद भारतीय अखबारों से देशभक्ति और स्वतंत्रता प्राप्ति की धारा फूटती थी। अखबारों पर अंग्रेजों का कितना दबाब था और इसके लिये ’स्वराज’ द्वारा अपने लिये प्रकाशित सम्पादक के विज्ञापन का उल्लेख भर करना पर्याप्त होगा । इस विज्ञापन के अनुसार, ‘‘चाहिए स्वराज के लिये एक सम्पादक, वेतन दो सूखी रोटियाँ, एक ग्लास ठंडा पानी और हर सम्पादकीय के लिये दस साल जेल ।“
        ब्रिटिश बर्बरता का जबाव अपनी कलम के माध्यम से देने वालों में प्रमुख समाचार पत्र थे-हिन्दू पैट्रियाट, अमृत बाजार पत्रिका, इंडियन मिरर, बंगालीसोम, प्रकाश,संजीवनी एडवोकेट, आजाद, हिन्दुस्तानी, रास गोफ्तार, पयामे आजादी, नेटिव ओपेनियन, इंदु प्रकाश, मराठा, केसरी, हिन्दू,स्वदेश मिलन, आंध्रप्रकाशिका, केरल पत्रिका, ट्रिब्यून कोहेनूर आदि। इन अखबारों की भूमिका का उल्लेख करते हुए डा. धर्मवीर भारती कहते हैं-‘‘स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता की परम्परा और भी परवान चढ़ती गयी। वह चाहे क्रांतिकारियों का सशस्त्र आंदोलन हो या गाँधीजी का सत्याग्रह, ये अखबार उनके माध्यम थे। जन जागरण के अग्रदूत थे, रोज जमानत माँगी जाती थी रोज-रोज पुलिस छापे मारती थी। सम्पादक का एक पाँव जेल में रहता था।“
         इन समाचार पत्रों के अतिरिक्त अनेक लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना भरी। इनमें बंकिमचंन्द्र की ‘आनंदमठ‘ और उनका गीत ‘वन्दे मातरम्‘ विशेष उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त मधुसूदन दा ने बंगाली में, भारतेन्दु हरीशचंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी एव मैथिलीषरण गुप्त ने हिन्दी में, चिपलूणकर ने मराठी में, भारती ने तमिल में तथा अन्य लेखकों ने राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत श्रेष्ठ साहित्य का सृजन करके राष्ट्रीय आंदोलन में जोश भरा। भारतेन्दु हरिष्चन्द्र ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘भारत-दुर्दशा‘ (1876) में भारत की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है। ’कवि वचन सुधा’ में उन्होनें अनुरोध किया है कि भारतीयों! अब किसी हाल में भारत का धन विदेशों में मत जाने दो। इन सबके आधार पर प्रो0 विपिन चन्द्र के इस कथन को स्वीकार करने में तनिक भी संशय नहीं रह जाता कि ‘‘ प्रेस ही वह मुख्य माध्यम थी जिसके जरिए राष्ट्रवादी विचारधारा वाले भारतीयों ने देशभक्ति के सन्देश और आधुनिक आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विचारों को प्रसारित किया और अखिल भारतीय चेतना का सृजन किया।“

7. विदेशों से सम्पर्क:- अंग्रेजों द्वारा शिक्षा को प्रोत्साहन दिये जाने का एक सुखद परिणाम यह हुआ कि भारतीयों का विदेशों से संपर्क स्थापित हुआ। यह बात अलग है कि यह विदेश भ्रमण शिक्षा, नौकरी एवं भ्रमण जैसे कई उद्देश्यों के तहत होता था। परन्तु सभी भारतीयों ने वहाँ जाकर स्थानीय लोकतांत्रिक विचारों, सिद्धांतों एवं संस्थाओं का अध्ययन किया और उनके व्यावहारिक पक्षों से भी अवगत हुए। फलस्वरूप उन्हें स्वतंत्रता, समानता और प्रजातंत्र के विषय में जानकारी हुई। श्री गुरूमुख निहालसिंह लिखते हैं कि-‘‘ इग्लैण्ड में उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक संस्थाओं की कार्य विधि का गहरा ज्ञान प्राप्त हो जाता था। वे स्वतंत्रता और स्वाधीनता का मूल्य समझ जाते थे तथा उनके मन में जगी हुई दासता की मनोवृत्ति घट जाती थी।“ इस प्रकार भारतीयों का विदेश भ्रमण उनकी स्वतंत्रता प्राप्ति में सहायक बना।

8. विदेशी घटनाओं का सकारात्मक प्रभाव:-इसी समय विदेशों में कई घटनाएँ घटी जिनसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इन घटनाओं में इंग्लैण्ड में सुधार कानूनों का पारित होना, अमेरिका में दास प्रथा समाप्त होना, फ्रांस में तृतीय गणतंत्र की स्थापना, इटली, जर्मनी, रूमानिया तथा सर्विया के राजनीतिक आंदोलन शामिल थे। इन आंदोलनों से भारतीयों को प्रेरणा मिली और उनके अंदर एक विश्वास जागा कि वे भी अंग्रेजों के खिलाफ एक सफल आंदोलन चलाकर उन्हें भारत से खदेड़ सकते हैं। आर. सी. मजूमदार के शब्दों में ‘‘ भारतीय सीमा से बाहर घटित इन घटनाओं ने स्वभावतः भारतीय राष्ट्रवाद की धारा को प्रभावित किया ।“ 

9. सामाजिक परिवर्तन:- पश्चात संस्कृति एवं आधुनिक शिक्षा नीति से परिचित होने के पश्चात भारतीय समाज में भी काफी परिवर्तन हुए। पश्चात प्रभाव एवं ब्रिटिश शासन द्वारा लागू सुधारों के फलस्वरूप भारतीयों के दिमाग में पुरानी कुरीतियों एवं अन्ध विश्वासों का स्थान एक नये प्रकाश ने ले लिया और अब वे हर बात को विज्ञान की कसौटी पर परखने लगे। सती प्रथा की समाप्ति, स्त्रियों एवं समाज के अन्य वर्गों के प्रति नया दृष्टिकोण, बाल विवाह का विरोध जैसे सुघारात्मक कार्यों से भारतीय समाज के कदम भी आधुनिकीकरण की दिशा में बढ़ चले। इससे समाज में एक नयी चेतना उत्पन्न हुई जिसने राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। इन सुधारों में सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों का भी प्रमुख हाथ रहा है। जिसे स्वीकार करते हुए डा0 अनिल सील कहते है,‘‘ धर्म निरपेक्ष राजनीतिक विचारधारा के पनपने के पहले ही इन सभाओं द्वारा शिक्षित भारतीयों को राष्ट्रीय आधार पर सोचने और संगठित होने की आदत पड़ी।“ 

10. जापान द्वारा रूस की पराजय:- 1940 के युद्ध में जब एशिया के एक छोटे से देश जापान ने यूरोप के एक बड़े देश रूस को पराजित किया तो भारतीयों के नैतिक साहस में भरपूर वृद्धि हुई। क्योंकि उस समय यूरोपीय राष्ट्र अजेय समझे जाते थे और इस सोच के चलते एशियाई देशों के नागरिक स्वयं को हीन समझते थे। इस युद्ध ने एक तरफ यूरोपीय जातियों के दम्भ को तोड़ा तो दूसरी ओर एशिया के लोगों को उनकी क्षमता का भान कराया। भारतीयों के लिए भी अपनी क्षमता और साहस में वृद्धि करने का यह अच्छा साधन सिद्ध हुआ।

11.शासकों का जातीय अहंकार:-अंग्रेज सदैव स्वयं को श्रेष्ठ एवं भारतीयों को निम्न जाति का समझकर व्यवहार करते थे जिससे भारत के लोगों में राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ। 1957 के विद्रोह के बाद तो अंग्रेज भारतीयों को ‘आधे वन मानुष आधे जंगली कहने लगे इससे दोनों के मध्य कटुता बढ़ी। भारतीयों के प्रति अंग्रेजों द्वारा अपनायी गयी इन नीतियों का कारण बताते हुए मि. गैरेट लिखते हैं-‘‘ उन्होनें अपने लिये एक विचित्र व्यवहार नीति अपनायी, जिसके तीन महत्वपूर्ण सिद्धांत थे, प्रथम यह है कि एक यूरोपियन का जीवन अनेक भारतीयों के जीवन के बराबर है। द्वितीय प्राच्य देशवासियों पर केवल भय के आधार पर ही शासन किया जा सकता है। तृतीय वे यहाँ लोकहित के लिये नहीं ‘वरन् अपने निजी लाभ एवं ऐश्वर्य के लिये आये हैं। “ अंग्रेजों की इस निम्न कोटि की सोच का परिणाम यह हुआ कि भारतीयों के स्वाभिमान एवं आत्म सम्मान पर आये दिन आक्रमण होने लगे। भारतीयों को जान से मार देने पर भी किसी कठोर दण्ड की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि वे सस्ते में ही छूट जाया करते थे। जातीय अहंकार का एक उदाहरण जी0ओ0 टेवेलियन के इस कथन में भी है, ‘‘कचहरी में उनके एक भी साक्ष्य का वजन असंख्य हिन्दुओं के साक्ष्य से अधिक होता है। यह ऐसी परिस्थिति है, जो एक बेईमान और लोभी अंग्रेज के हाथों में सत्ता का एक भयंकर उपकरण रख देती है। “अंग्रेजों के इस जातीय अहंकार के कारण भारतीयो के साथ उनके सम्बंघ बद से बदतर होते गये।

12. लार्ड लिटन की दमनकारी नीति:- लिटन सन् 1876-80 के दौरान भारत का वायसराय था। उसके शासनकाल में कई ऐसी घटनाएं हुई जिनसे भारतीय राष्ट्रवाद को बल प्राप्त हुआ। प्रो0 विपिन चन्द्र के शब्दों में, ’‘उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें दशक तक यह स्पष्ट हो गया था कि भारतीय राजनीतिक रंगमंच पर एक प्रमुख शक्ति के रूप में आने के लिये भारतीय राष्ट्रवाद ने पर्याप्त ताकत का संवेग प्राप्त कर लिया है पर लार्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी शासन ने उसे स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया। “लिटन के शासनकाल में ब्रिटेन से आने वाले कपड़ों पर से आयात कर को हटा दिया गया इससे भारतीय कपड़ा उद्योग पर बुरा असर पड़ा। अफगानिस्तान के साथ एवं एवं लम्बे युद्ध ने भी ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीयों की नाराजगी बढ़ायी क्योंकि इस युद्ध में भारतीय धन के अपव्यय से रुष्ट थे। इन सबसे बढ़कर सन् 1877 में दिल्ली के दरबार का आयोजन भारतीयों को अपने जले पर नमक छिड़कने के समान लगा। जिस समय यह आयोजन हुआ उसी समय दक्षिण भारत में भीषण अकाल पड़ा था। उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा राहत उपाय करने के स्थान पर ऐसे आयोजन करना जिनका उद्देश्य महारानी विक्टोरिया को ‘ भारत की सम्राज्ञी ‘ घोषित करना था, भारतीयों के गले नहीं उतरा। अंग्रेजों के इस कृत्य की आलोचना में भारतीयों का साथ समाचार पत्रों ने भी दिया। एक समाचार पत्र की टिप्पणी थी-‘‘ जब रोम जल रहा था तब नीरो बाँसुरी बजा रहा था ।‘‘ भारत के जन आंदोलन को समाप्त करने के उद्देश्य से ’वर्नाकुलर प्रेस एक्ट’ एवं शस्त्र कानून’ पारित किये गये पर इतिहास गवाह है कि इन कानूनों ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के बिखराव में नहीं बल्कि उसे संगठित करने में सहायता पहुँचायी। जातीय अहंकार की सोच से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने शस्त्र कानून’ पारित किया जिसके अनुसार बिना लाइसेंस के भारतीय शस्त्र नहीं रख सकते थे पर अंग्रेजों पर इस तरह का कोई बन्धन नहीं था। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के शब्दों में, ’’इस अधिनियम ने हमारे माथे पर जातीय हीनता की छाप लगा दी थी। “ इण्डियन सिविल सर्विस की परीक्षा के उम्मीदवारों की आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष करने के कृत्य से अंग्रेजों ने शिक्षित भारतीयों के एक बड़े वर्ग को अपने विरोधियों की जमात में खड़ा कर दिया था। इस प्रकार लिटन के कार्यों ने ब्रिटिश शासन के पतन को अवश्यम्भावी बना दिया। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी का यह कथन ठीक है कि, ‘‘लार्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी प्रशासन ने जनता को उसकी उदासीनता के दृष्टिकोण से जगाया है और जनजीवन को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। राजनीतिक प्रगति के उद्भव में बहुधा खराब शासक आशीर्वाद होते हैं। वे समुदाय को जगाने में मदद करते हैं। जिसमें वर्षों का आंदोलन भी असफल हो जाता हैं। “

13. इलबर्ट बिल पर विवाद:- इलवर्ट बिल के विवाद से कम से कम भारतीयों को एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि अब बिना संगठित आंदोलन के कुछ होने वाला नहीं है इलबर्ट बिल लार्ड रिवन के शासनकाल में तत्कालीन विधि सदस्य मि.इलबर्ट ने रखा था जिसमें भारतीय मजिस्ट्रेटों एवं जजों को अंग्रेजों के मुकदमे की सुनवाई और दण्ड देने के अधिकार का प्रस्ताव था पर अंग्रेजों का जातीय अहंकार यहाँ भी आड़े आया अंग्रेज इस बात की कल्पना करके सहर उठे कि काली चमड़ी वाले भारतीय अदालत में उन्हें खड़ा करके दण्डित करेंगे। इस स्थिति से बचने के लिये अंग्रेजों ने आंदोलन किया। फलस्वरूप बिल संशोधित हो गया अब यह प्रावधान किया गया कि भारतीय जज अंग्रेजों के मुकदमे की सुनवाई उसी जूरी की सहायता से कर सकते है जिसके कम से कम आधे सदस्य अंग्रेज हों। इस संबंध में हेनरी काटन ने कहा,‘‘ इस विधेयक और इसके विरोध में किये गये आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता पर जो प्रभाव डाला वह प्रभाव विधेयक के मूल रूप में पारित होने पर कभी नहीं हो सकता था।“

उपर्युक्त सभी कारण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को पुष्पित और पल्लवित करने में सहायक रहे, इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता है। यह बात अवश्य है कि इनमें से कुछ ने सीधे सीधे राष्ट्रवादी भावना को उभारा तो कुछ ने ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित की जिनमें इन भावनाओं को विकसित होने का सुअवसर मिल सका। अंग्रेजों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जितना दबाने की कोशिस की वह उतना ही उग्र से उग्रतर होता गया। इस आंदोलन को अखिल भारतीय बनाने में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बहुत बड़ा योगदान था ।

सुरेश कुमार पटेल
बी.ए. द्वितीय वर्ष
परिष्कार कॉलेज ऑफ ग्लोबल एक्सीलेंस , जयपुर