बुधवार, 15 नवंबर 2017

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उदय एवं उसके कारण

राष्ट्रीय आंदोलन का उदय एवं उसके कारण

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उदय 19 वीं शताब्दी की एक प्रमुख घटना थी मैकडोनाल्ड के शब्दों में, ‘‘ भारतीय राष्ट्रवाद राजनीतिक मण्डलों का नहीं अपितु इससे बहुत कुछ अधिक रहा है। यह एक ऐतिहासिक परम्परा का पुनरूज्जीवन है, एक राष्ट्र की आत्मा की मुक्ति है।‘‘ भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के उदय के पीछे एक नहीं अपितु अनेक कारण रहे जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-

1. 1857 का स्वतंत्रता संग्राम:- 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। उसे अधिकांश ब्रिटिश लेखकों ने सैनिक विद्रोह की संज्ञा दी है जो उचित नहीं है। यह सैनिक विद्रोह नहीं बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु भारतीयों का प्रथम जन-विद्रोह था। इस आंदोलन को दबाने के लिये अंग्रेजों ने अत्यधिक अमानवीयता से काम किया जिसका वर्णन करते हुये सर चाल्र्स डिस्के ने अपनी पुस्तक ग्रेटर इंडिया में लिखा है-
‘‘ अंग्रेजों ने अपने कैदियों की हत्या बिना न्यायिक कार्यवाही के इस ढंग से कर दी जो सभी भारतीयों की दृष्टि में पाश्विकता की चरम सीमा थी..........दमन के दौरान गाँव जला दिये गये। निर्दोष ग्रामीणों का वह कत्ले आम किया गया कि उससे मुहम्मद तुगलक भी शरमा जायेगा ।“ यह सत्य है कि योग्य नेतृत्व का अभाव, संचार एवं सैन्य व्यवस्था की कमी, तालमेल का अभाव जैसी कमियों के कारण यह आंदोलन सफल भले ही न हो पाया हो पर आंदोलन को दबाने में अंग्रेजों ने जिस अमानवीयता का परिचय दिया उससे भारतीय जनता भयभीत होने के स्थान पर स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु और अधिक कटिबद्ध हो गयी।
2. पश्चात शिक्षा का प्रभाव:- पश्चात शिक्षा से भी भारतीय राष्ट्रवाद को बल मिला क्योंकि शिक्षित होने के पश्चात भारतीयों को अन्य देशों के नागरिकों की तुलना में अपनी दीनता-हीनता का आभास हुआ और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इसका प्रमुख कारण है विदेशियों का उनके ऊपर शासन। यद्यपि लार्ड मैकाले ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा को लागू करवाने हेतु इसलिये बल दिया ताकि उसे शासन व्यवस्था में कम वेतन पर क्लर्क प्राप्त हो सकें। अर्थात् ऐसे व्यक्ति जो खून और वर्ण से तो भारतीय हो किंतु रूचि, विचार,शब्द और बुद्धि से अंग्रेज हों। 
मैकाले इस बात से भी भली भाँति परिचित था कि अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भारतीय ब्रिटिश लोकतांत्रिक शासन पद्धति की माँग करेंगे। इसीलिए उसने 1833 में कहा था-‘‘ अंग्रेजी इतिहास में वह गर्व का दिन होगा जब पश्चात ज्ञान में शिक्षित होकर भारतीय पश्चात संस्थानों की माँग करेंगे।’’ इस अंग्रेजी शिक्षा का भारतीयों पर मिला जुला प्रभाव हुआ। यह प्रभाव बुरा इस अर्थ में था कि अनेक भारतीय अपनी सभ्यता, संस्कृति, भाषा रीति-रिवाज और परम्पराओं को भूलकर अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति का गुणगान करने लगे इसके विपरीत भारतीयों को इस शिक्षा व्यवस्था से अनेक-नेक लाभ हुए। अंग्रेजी के प्रचार प्रसार से भारत के बाहर बसे लोगों के बीच भाषा की एकता स्थापित हो गयी इसके अतिरिक्त उन्हें मिल, मिल्टन तथा बर्क जैसे महान व्यक्तियों के विचारों का ज्ञान हुआ। उनमें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत हुई। इसे अपने लिए वे आवश्यक मानने लगे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव की चर्चा करते हुए ए.आर.देसाई ने लिखा है ‘‘ शिक्षित भारतीयों ने अमरीका, इटली और आयरलैण्ड के स्वतंत्रता संग्रामों के संबंध में पढ़ा। उन्होंने ऐसे लेखकों की रचनाओं का अनुशीलन किया जिन्होंने व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्वाधीनता के सिद्धान्तों का प्रचार किया है। ये शिक्षित भारतीय भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक और बौद्धिक नेता हो गये।

पश्चात शिक्षा का स्पष्ट प्रभाव 1885 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में दृष्टिगोचर हुआ जहाँ अंग्रेजी भाषा के द्वारा ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने एक दूसरे के विचारों को समझा। राजा राममोहन राय, गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी, व्योमेश चन्द्र वनर्जी आदि इस अंगे्रजी शिक्षा की ही देन थे। इन्होंने देश को स्वतंत्र कराने में महती भूमिका अदा की । अंग्र्रेजी शिक्षा प्राप्ति के पश्चात जब भारतीय ब्रिटेन एवं अन्य देशों के भ्रमण पर गये तो वहाँ की व्यवस्था देखकर अवाक रह गये। तत्पश्चात उन्होंने अपने लिए भी स्वशासन की माँग की। इस दृष्टि से डॉ. जकारिया का यह कथन सत्य है कि ‘‘अंग्रेजों ने 125 वर्ष पूर्व शिक्षा का जो कार्य आरम्भ किया उससे अधिक हितकर और कोई कार्य उन्होंने भारत वर्ष में नहीं किया।’’

3. राजनीतिक एकता:- भारत प्राचीन एवं मध्यकाल में सांस्कृतिक दृष्टि से एक था पर यह एकता सर्वथा अस्थिर थी अशोक, समुद्र गुप्त, अकबर एवं औरंगज़ेब ने भारत के एक बड़े भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया पर वे उसे स्थिर नहीं रख सके। प्रो. विपिन चन्द्र ने इसे स्वीकार करते हुये अपनी पुस्तक‘‘ भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’’ में लिखा है। ‘‘........दादा भाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी और तिलक से लेकर गाँधीजी और जवाहर लाल नेहरू तक राष्ट्रीय नेताओं ने स्वीकार किया कि भारत पूरी तरह से सुसंगठित राष्ट्र नहीं है। यह एक ऐसा राष्ट्र है जो बनने की प्रक्रिया में है।“ भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करने में अंग्रेज बड़े सहायक सिद्ध हुए। अंग्रेजों ने भारत में शासन की एकता स्थापित करके उसे एक राजनीतिक इकाई का रूप दिया।

यातायात के साधनों के विकास के फलस्वरूप देश के विभिन्न कोनों के लोग सुविधा पूर्वक एक दूसरे के संपर्क में आए जिससे उनकी स्थानीय भक्ति का स्थान राष्ट्रीय भक्ति ने ले लिया। हालांकि अंग्रेजों ने भारत में यातायात का विकास अत्यधिक आर्थिक दोहन एवं सेना के सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से किया था पर जैसा कि जवाहर लाल नेहरू का कथन है ‘‘ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित भारत की राजनीतिक एकता सामान्य एकता की अधीनता थी लेकिन उसने सामान्य राष्ट्रीयता की एकता को जन्म दिया’’8 इस प्रकार एकता की भावना ने राष्ट्रीयता के विकास की भावना का मार्ग प्रशस्त किया।

4. सामाजिक एवं धार्मिक आंदोलन:-राष्ट्रीय भावना की उत्पत्ति में 19 वीं शताब्दी के सामाजिक एवं धार्मिक आंदोलनों का मुख्य स्थान है। राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज, स्वामी दयानंद सरस्वती एवं आर्य समाज, स्वामी विवेकानन्द एवं रामकृष्ण मिशन, श्रीमती एनी बेसेन्ट एवं थियोसोफिकल सोसाइटी ने अपने विचारों एवं आंदोलनों के माध्यम से भारतीय जनता को यह सन्देश दिया कि उनका धर्म एवं संस्कृति श्रेष्ठ है। इन विचारों ने भारतीयों को उनके धर्म एवं समाज में व्याप्त दोषों और कुरीतियों के प्रति आगाह किया। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज में व्याप्त सती-प्रथा, विधवा-विवाह तथा बाल-विवाह जैसी कुरीतियों के विरूद्ध जनमत तैयार हुआ, जिससे इन पर रोक लग सकी। इन सुधार आंदोलनों के परिणाम स्वरूप सामाजिक कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों का विनाश होने से भारतीयों में नव जागरण का सूत्र पात हुआ और नवोत्साह से वे देश की स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रयास करने लगे।

5. शिक्षित भारतीयों में असंतोष:- पश्चात शिक्षा के फलस्वरूप भारतीयों में एक नवीन शिक्षित वर्ग का उदय हुआ जो शासन व्यवस्था में भागीदार बनने हेतु उद्यत था। परन्तु 1833 के अधिनियम एवं 1850 के ब्रिटिश सम्राज्ञी की इस स्पष्ट घोषणा के बावजूद कि भारतीयों को वर्ण, जाति, भाषा या धर्म आदि के आधार पर कोई पद प्रदान करने से वंचित नहीं किया जायेगा, शिक्षित भारतीयो को उच्च पदों से दूर रखने की हर संभव कोशिश की जाती रही। इससे शिक्षित भारतीय असंतुष्ट हो गये। 
      अंग्रेजों की इस कथनी और करनी का अंतर अनेक भारतीयों को प्रतिष्ठित ‘भारतीय नागरिक सेवा ञ परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात उन्हें सेवा का अवसर न देना या किसी छोटी सी गलती के फलस्वरूप उन्हें नौकरी के लिए अयोग्य घोषित कर देना ऐसी ही घटनाएँ थी। अरविन्द घोष को परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात घुड़सवारी में प्रवीण न होने का आरोप लगाकर नौकरी से वंचित कर दिया गया। जब 1877 में इसी प्रतियोगी परीक्षा हेतु परीक्षार्थियों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 कर दी गई तो शिक्षित भारतीय नवयुवकों में अत्यधिक अंसतोष फैला क्योंकि योग्यता रखते हुये भी उन्हें उच्च पदों से वंचित रखने की यह एक चाल थी। ब्रिटिश शासन के इस अवांछनीय कदम से भारतीय नवयुवक राष्ट्रीय आन्दोलन हेतु कटिबद्ध हो गये। ब्रिटिश शासन के इस कदम का विरोध करने के लिये सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने भारत का दौरा किया और जनता को इन अन्यायों का विरोध करने के लिये प्रेरित किया। भारत की इन शिकायतों को ब्रिटिश सरकार के समक्ष रखने हेतु लाल मोहन घोष को इंग्लैण्ड भेजा गया। इस प्रकार इस आंदोलन ने राष्ट्रीय जाग्रति फैलाने में अपना योगदान दिया।

6.  भारत का आर्थिक शोषण:- अंग्रेज भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आये थे और यहाँ के शासकों की कमजोरी का फायदा उठाकर वे राजनीतिक क्षेत्र में भी सर्वेसर्वा बन गये। राजनैतिक क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित होने से उन्हें भारत का आर्थिक शोषण करने में भी सरलता हुई। अंग्रेजों के इस आर्थिक शोषण से भारत के उद्योगों एवं कृषि का नाश तो हुआ ही साथ ही व्यापार पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा। बर
     प्रतिबन्धों के बावजूद भारतीय अखबारों से देशभक्ति और स्वतंत्रता प्राप्ति की धारा फूटती थी। अखबारों पर अंग्रेजों का कितना दबाब था और इसके लिये ’स्वराज’ द्वारा अपने लिये प्रकाशित सम्पादक के विज्ञापन का उल्लेख भर करना पर्याप्त होगा । इस विज्ञापन के अनुसार, ‘‘चाहिए स्वराज के लिये एक सम्पादक, वेतन दो सूखी रोटियाँ, एक ग्लास ठंडा पानी और हर सम्पादकीय के लिये दस साल जेल ।“
        ब्रिटिश बर्बरता का जबाव अपनी कलम के माध्यम से देने वालों में प्रमुख समाचार पत्र थे-हिन्दू पैट्रियाट, अमृत बाजार पत्रिका, इंडियन मिरर, बंगालीसोम, प्रकाश,संजीवनी एडवोकेट, आजाद, हिन्दुस्तानी, रास गोफ्तार, पयामे आजादी, नेटिव ओपेनियन, इंदु प्रकाश, मराठा, केसरी, हिन्दू,स्वदेश मिलन, आंध्रप्रकाशिका, केरल पत्रिका, ट्रिब्यून कोहेनूर आदि। इन अखबारों की भूमिका का उल्लेख करते हुए डा. धर्मवीर भारती कहते हैं-‘‘स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता की परम्परा और भी परवान चढ़ती गयी। वह चाहे क्रांतिकारियों का सशस्त्र आंदोलन हो या गाँधीजी का सत्याग्रह, ये अखबार उनके माध्यम थे। जन जागरण के अग्रदूत थे, रोज जमानत माँगी जाती थी रोज-रोज पुलिस छापे मारती थी। सम्पादक का एक पाँव जेल में रहता था।“
         इन समाचार पत्रों के अतिरिक्त अनेक लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना भरी। इनमें बंकिमचंन्द्र की ‘आनंदमठ‘ और उनका गीत ‘वन्दे मातरम्‘ विशेष उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त मधुसूदन दा ने बंगाली में, भारतेन्दु हरीशचंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी एव मैथिलीषरण गुप्त ने हिन्दी में, चिपलूणकर ने मराठी में, भारती ने तमिल में तथा अन्य लेखकों ने राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत श्रेष्ठ साहित्य का सृजन करके राष्ट्रीय आंदोलन में जोश भरा। भारतेन्दु हरिष्चन्द्र ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘भारत-दुर्दशा‘ (1876) में भारत की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है। ’कवि वचन सुधा’ में उन्होनें अनुरोध किया है कि भारतीयों! अब किसी हाल में भारत का धन विदेशों में मत जाने दो। इन सबके आधार पर प्रो0 विपिन चन्द्र के इस कथन को स्वीकार करने में तनिक भी संशय नहीं रह जाता कि ‘‘ प्रेस ही वह मुख्य माध्यम थी जिसके जरिए राष्ट्रवादी विचारधारा वाले भारतीयों ने देशभक्ति के सन्देश और आधुनिक आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विचारों को प्रसारित किया और अखिल भारतीय चेतना का सृजन किया।“

7. विदेशों से सम्पर्क:- अंग्रेजों द्वारा शिक्षा को प्रोत्साहन दिये जाने का एक सुखद परिणाम यह हुआ कि भारतीयों का विदेशों से संपर्क स्थापित हुआ। यह बात अलग है कि यह विदेश भ्रमण शिक्षा, नौकरी एवं भ्रमण जैसे कई उद्देश्यों के तहत होता था। परन्तु सभी भारतीयों ने वहाँ जाकर स्थानीय लोकतांत्रिक विचारों, सिद्धांतों एवं संस्थाओं का अध्ययन किया और उनके व्यावहारिक पक्षों से भी अवगत हुए। फलस्वरूप उन्हें स्वतंत्रता, समानता और प्रजातंत्र के विषय में जानकारी हुई। श्री गुरूमुख निहालसिंह लिखते हैं कि-‘‘ इग्लैण्ड में उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक संस्थाओं की कार्य विधि का गहरा ज्ञान प्राप्त हो जाता था। वे स्वतंत्रता और स्वाधीनता का मूल्य समझ जाते थे तथा उनके मन में जगी हुई दासता की मनोवृत्ति घट जाती थी।“ इस प्रकार भारतीयों का विदेश भ्रमण उनकी स्वतंत्रता प्राप्ति में सहायक बना।

8. विदेशी घटनाओं का सकारात्मक प्रभाव:-इसी समय विदेशों में कई घटनाएँ घटी जिनसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इन घटनाओं में इंग्लैण्ड में सुधार कानूनों का पारित होना, अमेरिका में दास प्रथा समाप्त होना, फ्रांस में तृतीय गणतंत्र की स्थापना, इटली, जर्मनी, रूमानिया तथा सर्विया के राजनीतिक आंदोलन शामिल थे। इन आंदोलनों से भारतीयों को प्रेरणा मिली और उनके अंदर एक विश्वास जागा कि वे भी अंग्रेजों के खिलाफ एक सफल आंदोलन चलाकर उन्हें भारत से खदेड़ सकते हैं। आर. सी. मजूमदार के शब्दों में ‘‘ भारतीय सीमा से बाहर घटित इन घटनाओं ने स्वभावतः भारतीय राष्ट्रवाद की धारा को प्रभावित किया ।“ 

9. सामाजिक परिवर्तन:- पश्चात संस्कृति एवं आधुनिक शिक्षा नीति से परिचित होने के पश्चात भारतीय समाज में भी काफी परिवर्तन हुए। पश्चात प्रभाव एवं ब्रिटिश शासन द्वारा लागू सुधारों के फलस्वरूप भारतीयों के दिमाग में पुरानी कुरीतियों एवं अन्ध विश्वासों का स्थान एक नये प्रकाश ने ले लिया और अब वे हर बात को विज्ञान की कसौटी पर परखने लगे। सती प्रथा की समाप्ति, स्त्रियों एवं समाज के अन्य वर्गों के प्रति नया दृष्टिकोण, बाल विवाह का विरोध जैसे सुघारात्मक कार्यों से भारतीय समाज के कदम भी आधुनिकीकरण की दिशा में बढ़ चले। इससे समाज में एक नयी चेतना उत्पन्न हुई जिसने राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। इन सुधारों में सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों का भी प्रमुख हाथ रहा है। जिसे स्वीकार करते हुए डा0 अनिल सील कहते है,‘‘ धर्म निरपेक्ष राजनीतिक विचारधारा के पनपने के पहले ही इन सभाओं द्वारा शिक्षित भारतीयों को राष्ट्रीय आधार पर सोचने और संगठित होने की आदत पड़ी।“ 

10. जापान द्वारा रूस की पराजय:- 1940 के युद्ध में जब एशिया के एक छोटे से देश जापान ने यूरोप के एक बड़े देश रूस को पराजित किया तो भारतीयों के नैतिक साहस में भरपूर वृद्धि हुई। क्योंकि उस समय यूरोपीय राष्ट्र अजेय समझे जाते थे और इस सोच के चलते एशियाई देशों के नागरिक स्वयं को हीन समझते थे। इस युद्ध ने एक तरफ यूरोपीय जातियों के दम्भ को तोड़ा तो दूसरी ओर एशिया के लोगों को उनकी क्षमता का भान कराया। भारतीयों के लिए भी अपनी क्षमता और साहस में वृद्धि करने का यह अच्छा साधन सिद्ध हुआ।

11.शासकों का जातीय अहंकार:-अंग्रेज सदैव स्वयं को श्रेष्ठ एवं भारतीयों को निम्न जाति का समझकर व्यवहार करते थे जिससे भारत के लोगों में राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ। 1957 के विद्रोह के बाद तो अंग्रेज भारतीयों को ‘आधे वन मानुष आधे जंगली कहने लगे इससे दोनों के मध्य कटुता बढ़ी। भारतीयों के प्रति अंग्रेजों द्वारा अपनायी गयी इन नीतियों का कारण बताते हुए मि. गैरेट लिखते हैं-‘‘ उन्होनें अपने लिये एक विचित्र व्यवहार नीति अपनायी, जिसके तीन महत्वपूर्ण सिद्धांत थे, प्रथम यह है कि एक यूरोपियन का जीवन अनेक भारतीयों के जीवन के बराबर है। द्वितीय प्राच्य देशवासियों पर केवल भय के आधार पर ही शासन किया जा सकता है। तृतीय वे यहाँ लोकहित के लिये नहीं ‘वरन् अपने निजी लाभ एवं ऐश्वर्य के लिये आये हैं। “ अंग्रेजों की इस निम्न कोटि की सोच का परिणाम यह हुआ कि भारतीयों के स्वाभिमान एवं आत्म सम्मान पर आये दिन आक्रमण होने लगे। भारतीयों को जान से मार देने पर भी किसी कठोर दण्ड की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि वे सस्ते में ही छूट जाया करते थे। जातीय अहंकार का एक उदाहरण जी0ओ0 टेवेलियन के इस कथन में भी है, ‘‘कचहरी में उनके एक भी साक्ष्य का वजन असंख्य हिन्दुओं के साक्ष्य से अधिक होता है। यह ऐसी परिस्थिति है, जो एक बेईमान और लोभी अंग्रेज के हाथों में सत्ता का एक भयंकर उपकरण रख देती है। “अंग्रेजों के इस जातीय अहंकार के कारण भारतीयो के साथ उनके सम्बंघ बद से बदतर होते गये।

12. लार्ड लिटन की दमनकारी नीति:- लिटन सन् 1876-80 के दौरान भारत का वायसराय था। उसके शासनकाल में कई ऐसी घटनाएं हुई जिनसे भारतीय राष्ट्रवाद को बल प्राप्त हुआ। प्रो0 विपिन चन्द्र के शब्दों में, ’‘उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें दशक तक यह स्पष्ट हो गया था कि भारतीय राजनीतिक रंगमंच पर एक प्रमुख शक्ति के रूप में आने के लिये भारतीय राष्ट्रवाद ने पर्याप्त ताकत का संवेग प्राप्त कर लिया है पर लार्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी शासन ने उसे स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया। “लिटन के शासनकाल में ब्रिटेन से आने वाले कपड़ों पर से आयात कर को हटा दिया गया इससे भारतीय कपड़ा उद्योग पर बुरा असर पड़ा। अफगानिस्तान के साथ एवं एवं लम्बे युद्ध ने भी ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीयों की नाराजगी बढ़ायी क्योंकि इस युद्ध में भारतीय धन के अपव्यय से रुष्ट थे। इन सबसे बढ़कर सन् 1877 में दिल्ली के दरबार का आयोजन भारतीयों को अपने जले पर नमक छिड़कने के समान लगा। जिस समय यह आयोजन हुआ उसी समय दक्षिण भारत में भीषण अकाल पड़ा था। उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा राहत उपाय करने के स्थान पर ऐसे आयोजन करना जिनका उद्देश्य महारानी विक्टोरिया को ‘ भारत की सम्राज्ञी ‘ घोषित करना था, भारतीयों के गले नहीं उतरा। अंग्रेजों के इस कृत्य की आलोचना में भारतीयों का साथ समाचार पत्रों ने भी दिया। एक समाचार पत्र की टिप्पणी थी-‘‘ जब रोम जल रहा था तब नीरो बाँसुरी बजा रहा था ।‘‘ भारत के जन आंदोलन को समाप्त करने के उद्देश्य से ’वर्नाकुलर प्रेस एक्ट’ एवं शस्त्र कानून’ पारित किये गये पर इतिहास गवाह है कि इन कानूनों ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के बिखराव में नहीं बल्कि उसे संगठित करने में सहायता पहुँचायी। जातीय अहंकार की सोच से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने शस्त्र कानून’ पारित किया जिसके अनुसार बिना लाइसेंस के भारतीय शस्त्र नहीं रख सकते थे पर अंग्रेजों पर इस तरह का कोई बन्धन नहीं था। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के शब्दों में, ’’इस अधिनियम ने हमारे माथे पर जातीय हीनता की छाप लगा दी थी। “ इण्डियन सिविल सर्विस की परीक्षा के उम्मीदवारों की आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष करने के कृत्य से अंग्रेजों ने शिक्षित भारतीयों के एक बड़े वर्ग को अपने विरोधियों की जमात में खड़ा कर दिया था। इस प्रकार लिटन के कार्यों ने ब्रिटिश शासन के पतन को अवश्यम्भावी बना दिया। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी का यह कथन ठीक है कि, ‘‘लार्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी प्रशासन ने जनता को उसकी उदासीनता के दृष्टिकोण से जगाया है और जनजीवन को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। राजनीतिक प्रगति के उद्भव में बहुधा खराब शासक आशीर्वाद होते हैं। वे समुदाय को जगाने में मदद करते हैं। जिसमें वर्षों का आंदोलन भी असफल हो जाता हैं। “

13. इलबर्ट बिल पर विवाद:- इलवर्ट बिल के विवाद से कम से कम भारतीयों को एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि अब बिना संगठित आंदोलन के कुछ होने वाला नहीं है इलबर्ट बिल लार्ड रिवन के शासनकाल में तत्कालीन विधि सदस्य मि.इलबर्ट ने रखा था जिसमें भारतीय मजिस्ट्रेटों एवं जजों को अंग्रेजों के मुकदमे की सुनवाई और दण्ड देने के अधिकार का प्रस्ताव था पर अंग्रेजों का जातीय अहंकार यहाँ भी आड़े आया अंग्रेज इस बात की कल्पना करके सहर उठे कि काली चमड़ी वाले भारतीय अदालत में उन्हें खड़ा करके दण्डित करेंगे। इस स्थिति से बचने के लिये अंग्रेजों ने आंदोलन किया। फलस्वरूप बिल संशोधित हो गया अब यह प्रावधान किया गया कि भारतीय जज अंग्रेजों के मुकदमे की सुनवाई उसी जूरी की सहायता से कर सकते है जिसके कम से कम आधे सदस्य अंग्रेज हों। इस संबंध में हेनरी काटन ने कहा,‘‘ इस विधेयक और इसके विरोध में किये गये आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता पर जो प्रभाव डाला वह प्रभाव विधेयक के मूल रूप में पारित होने पर कभी नहीं हो सकता था।“

उपर्युक्त सभी कारण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को पुष्पित और पल्लवित करने में सहायक रहे, इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता है। यह बात अवश्य है कि इनमें से कुछ ने सीधे सीधे राष्ट्रवादी भावना को उभारा तो कुछ ने ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित की जिनमें इन भावनाओं को विकसित होने का सुअवसर मिल सका। अंग्रेजों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जितना दबाने की कोशिस की वह उतना ही उग्र से उग्रतर होता गया। इस आंदोलन को अखिल भारतीय बनाने में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बहुत बड़ा योगदान था ।

सुरेश कुमार पटेल
बी.ए. द्वितीय वर्ष
परिष्कार कॉलेज ऑफ ग्लोबल एक्सीलेंस , जयपुर

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

भारतीय किसानों की स्थिति एवम् गाँधीजी के अनुसार इसका मूल्यांकन


भारत देश में किसानों पर हो रहे अत्याचार कोई नई बात नहीं है। भारतीय किसान अंग्रेजो के समय से ही अन्याय और जुल्म के शिकार हो रहे हैं | मैं बात करता हूं उस समय की जब महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे | उस समय संपूर्ण भारत देश के किसान ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानून से ग्रस्त थे | कुछ ऐसा ही हाल बिहार के चंपारण जिले का भी था | उस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन द्वारा किसानों पर एक 'तीन कथिया' नामक दमनकारी कानून लागू किया गया था | जिसके तहत किराएदार किसानों को अपनी भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया गया था जिसका बहुत ही कम मूल्य किसानों को दिया जाता था | इस कारण कई बार किसानों को खेती करने के लिए ऋण लेना भी पड़ जाता था | किसानों द्वारा उगाए हुए अन्न का एक  बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में देना पड़ता था| किसानों के छोटे बच्चों से सरकार अपने खेतों में मुफ्त काम करवाती थी उस समय गांव की महिलाओं को ब्रिटिश रानियों की चाकरी करने को बाध्य किया जाता था |
इन सब कारणों से किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई  थी |

महात्मा गांधी के किसानों की स्थिति के बारे में विचार:-

महात्मा गांधी अपने संपूर्ण जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से किसानों के साथ जुड़े हुए थे | उन्होंने कहा था कि भारतीय जनता कुछ गिने चुने शहरों की बजाए भारत के 7 लाख  गांव में रहती है | भारत एक कृषि प्रधान देश है| अगर इस देश के अन्नदाता 'किसानों' के साथ अन्याय और अत्याचार होते हैं तो यह बड़ा ही  दुखद विषय है तथा मैं इसका विरोध कर किसानों को न्याय दिलाऊँगा | गांधी जी का उपर्युक्त कथन हमें देखने को मिलता है बिहार के 'चंपारण आंदोलन' के रूप में|
महात्मा गांधी ने जितने भी आंदोलन किए उनके केंद्र में 'किसान' था|

वर्तमान किसानों की स्थिति का विश्लेषण  :-
वर्तमान समय में और उस समय की किसानों की स्थिति जून में 19-20 का ही अंतर आया है |
आज भारत की 70% आबादी गांवो में रहती है जो प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है|
61% कृषि वर्षा पर निर्भर करती है | सरकार द्वारा नहरे एवं भंडारण सुविधाएं (झीलो, बांधो आदि) के निर्माण के तहत है लेकिन वर्तमान स्थिति सुधारने के लिए पर्याप्त नहीं हैं |
महाराष्ट्र में भारत सरकार द्वारा निर्मित 40% बांध हैं परंतु वे उन स्थानों पर नहीं है जहां उनकी  आवश्यकता है जिस कारण इसका लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है |

आज के समय भारतीय किसानो की स्थिति अत्यंत दयनीय हैं जिसके बहुत से प्रमुख कारण हैं-
खेती करने के लिए बैंकों द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने में असमर्थता, सुखे एवं बाढ जैसे अनियमित मौसम की स्थिति के कारण फसलों को नुकसान, अप्रिय सरकारी नीतियां,  जीएम फसलें, परिवार की मांग पूरी न कर पाना आदि ऐसे प्रमुख कारण है |

भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा किसानों के बिना कृषि संभव नहीं हैं| वर्तमान में हमारे अन्नदाताओं की ऐसी परिस्थितियां देखकर आंखों में पानी आ जाता है |
आज भारतीय किसान गरीबी, भुखमरी, ऋण आदि से इतना त्रस्त हो गए हैं कि वे आत्महत्या पर उतारू हो गए हैं| एनसीआरबी के एक शोध के अनुसार भारत में `46 किसान' प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं |
वर्ष 2004 में सबसे अधिक किसानों (18241) ने आत्महत्या की थी |
वहीं पिछले वर्ष की बात करें तो लगभग 16000 किसानों ने इन समस्याओं से तंग आकर आत्महत्या की थी|
पिछले कुछ दिनों से भारत के विभिन्न राज्यों में किसानों द्वारा कर्ज माफी के लिए जगह-जगह आंदोलन किए जा रहे हैं | राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में भी किसान अपने 11 सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं|
वर्तमान की किसानों संबंधी ये स्थितियां  किस प्रकार सुधारी जाए यह एक विचारणीय मुद्दा है |

मेरे विचार - भारतीय किसानों की जो वाजिब मांगे हैं उन्हें सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया जाना चाहिए | किसानों की हालत सुधारने के लिए उन्हें खेती की  आधुनिक विधियां सिखाई जानी चाहिए|  उन्हें साक्षर बनाना चाहिए | उनके शिक्षित होने के नाते उन्हें बहुत मदद मिलती है वे प्रयोगशाला में अपने खेतों की मिट्टी का परीक्षण करवा लेंगे जिससे वे समझ जाएंगे कि उनके क्षेत्र में सर्वाधिक फसल किसकी होगी | कुछ राज्यों में फसल चक्र प्रणाली और अनुबंध फसल प्रणाली शुरू कर दी गई है | इस तरह के कदम किसानों को सही दिशा में ले जाते हैं और लंबे समय तक कृषि करने में मदद मिलती है| वर्तमान में कुछ दिनों से किसानों द्वारा जगह-जगह आंदोलन किए जा रहे हैं | वे अपनी मांगे मनवाने के लिए चक्काजाम, धरना, रैली निकाल रहे हैं |
उनका ये आंदोलन सही  भी है,  मैं उनका समर्थन करता हूं लेकिन आज मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक बन रहा है जो गलत है | कुछ स्थानों पर चक्काजाम, धरने आदि के लिए लोगों को पैसे देकर लाया जा रहा है , कुछ ऐसे भी किसान हैं जो अपने कुछ ऐसे भी किसान हैं जो अपने आलीशान बंगलों से अपनी लग्जरी गाड़ियो में बैठकर आंदोलन, धरने के लिए आते हैं| क्या यही वे किसान हैं? या फिर वे लोग जो वास्तव में भुखमरी, बीमारी, गरीबी से जूझ रहे हैं वे किसान हैं | ये भी एक सोचने वाली बात है | मेरे विचार यह है कि सरकार को जो किसान वास्तव में कर्ज माफी या किसानों की अन्य जो मांगे हैं , के हकदार हैं , उनकी मांगे सरकार को पूरी कर देनी चाहिए |

                       आयुष
                बी. ए. प्रथम वर्ष
  परिष्कार कॉलेज ऑफ ग्लोबल एक्सीलेंस , जयपुर

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

लोकतंत्र और सतत् विकास

लोकतंत्र (डेमोक्रेसी) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक मूल शब्द डेमोस से हुई है जिसका अर्थ है 'जनसाधारण' और इस शब्द में 'क्रेसी' शब्द जोड़ा गया है जिसका अर्थ  'शासन' होता है| इस प्रकार डेमोस + क्रेस= डेमोक्रेसी का शाब्दिक अर्थ होता है 'जनता का शासन' |

अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा कि लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन है  | लोकतंत्र एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिससे लोक सहमती की आवश्यकता होती है| इसमें निर्णय जनता की सहमति से लोकहित में लिए जाते हैं, जिसमें जनता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन में भागीदारी करती है| जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी में शासन संबंधी सभी निर्णय स्वयं जनता द्वारा लिए जाते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष भागीदारी में जनता के प्रतिनिधि शासन संबंधी निर्णय  करते हैं | ये प्रतिनिधि समय-समय पर जनता के बीच जाकर अपना विश्वास हासिल करते हैं ताकि उनके प्रति विश्वास की निरंतरता का स्पष्टीकरण हो सके|

लोकतंत्र में राजनीतिक व्यवस्था के बारे में सोचने पर लोकतंत्र की प्रमुख विशेषताएं ध्यान में आती है -
१. जनता की इच्छा की सर्वोच्चता
२.जनता द्वारा चुनी हुई सरकार
३.निष्पक्ष आवधिक चुनाव
४.वयस्क मताधिकार
५. उत्तरदायी सरकार
६. सीमित तथा संवैधानिक सरकार
७. सरकार के हाथ में राजनीतिक शक्ति जनता की अमानत के रूप में
८.सरकार के निर्णयो में सलाह, दबाव तथा जनमत के द्वारा जनता का हिस्सा
९. जनता के अधिकारों एवं स्वतंत्रता की हिफाजत करना सरकार का कर्तव्य
१०.निष्पक्ष न्यायालय
११. कानून का शासन
१२.  विभिन्न राजनीतिक दलो तथा दबाव समूहो की उपस्थिति
लोकतंत्र में  विकास एक सतत् प्रक्रिया है , इसे रुकना नहीं चाहिए|

सतत् विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) मूलतः दो  शब्दों 'सस्टेनेबल' व 'डेवलपमेंट' से मिलकर बना है | हिंदी भाषा में इनका अर्थ क्रमश: स्थायी, सतत व विकास होता है |
ब्रंटलेंड कमीशन के अनुसार सतत विकास वह अवधारणा है जिसमें भविष्य की पीढियो की जरूरतों में किसी तरह के समझौते किए बगैर वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करना है |
संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों ने 25 सितंबर 2015 को आयोजित 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट' में सतत विकास के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 'एजेंडा फॉर 2030' को स्वीकार किया | इसके तहत वर्ष 2030 तक गरीबी, असमानता व  अन्याय के खिलाफ संघर्ष और जलवायु परिवर्तन की समस्याओं से निपटने के लिए17 सतत विकास लक्ष्य क्या है , जो इस प्रकार है-
1.गरीबी से मुक्ति
2.भुखमरी से मुक्ति
3.बेहतर स्वास्थ्य
4.गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
5.लैंगिंग समानता    
6. स्वच्छ जल व स्वच्छता
7.सुलभ एव स्वच्छ ऊर्जा
8. उचित रोजगार तथा आर्थिक विकास
9.  उद्योग ,नवोन्मेष और बुनियादी ढांचा
10. समानता उन्मूलन
11. स्थायी शहर और समुदाय
12.स्थायी खपत और उत्पादन
13. जलवायु
14.जल में जीवन
15.भूमि पर जीवन
16.शांति अन्याय एवं मजबूत संस्थान
17. लक्ष्यो के लिए भागीदारी l

वर्तमान में भारत के समक्ष सतत विकास से जुड़ी बहुत सी चुनौतियां है जैसे -
>  सतत विकास के लक्ष्यों के लिए धन उपलब्ध कराना- एक अध्ययन के अनुसार 2030 तक लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत को 14.4 अरब डॉलर खर्च करना होगा |
>  आर्थिक वृद्धि और संपत्ति का समुचित वितरण में संतुलन न होना - वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन में बताया गया था कि 2010 तक दुनिया के1.2अरब बेहद गरीब लोगों में से एक तिहाई संख्या भारत में बसती है|
> निगरानी और जिम्मेवारी -उचित संख्यनात्मक तंत्र अभी तक नहीं बनाया जा सकता है |
> प्रगति का मापन- उपलब्धियों का आंकलन और मापन करना भी जरूरी है|

भारत सरकार द्वारा क्रियान्वित किए जा रहे अनेक कार्यक्रम सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है जिसमें -मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण और शहरी दोनों, डिजिटल इंडिया, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, स्किल इंडिया, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शामिल है l                                  

आयुष
बी.ए. प्रथम वर्ष
परिष्कार कॉलेज ऑफ ग्लोबल एक्सीलेंस,जयपुर

सोमवार, 25 सितंबर 2017

डिजिटल इंडिया

डिजिटल इंडिया भारत सरकार का यह प्रोजेक्ट है जिसके जरिए सभी ग्राम पंचायत को इंटरनेट ब्रॉडबैंड  के जरिए जोड़ा जाएगा| जिसके तहत ई प्रकाशन को बढ़ावा देने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था सुधारने का लक्ष्य है | इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत 335 गांव को हाई स्पीड इंटरनेट के जरिए जोड़ा जाएगा| डीआईपी का विमोचन 1 जुलाई 2015 को इंदिरा गांधी स्टेडियम में किया गया डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट के कार्यक्रम में कई कंपनियों के सीईओ ने भाग लिया| इसमें मुकेश अंबानी, साइरस मिस्त्री, अजीज प्रेमजी, सुनील मित्तल आदि सम्मिलित हुए|

डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट के लाभ :-
सभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट से जोड़ा जाएगा| शहरों में इंटरनेट को बहुत अच्छे से समझ चुके हैं लेकिन फिर भी ई-शॉपिंग, ई स्टडी, ई टिकट, ई बैंकिंग की तरफ  रुझान केवल महानगरों में हैं | छोटे शहर इस तरह की सुविधाओं के प्रति अभी जागरुक नहीं है जबकि यह सब डिजिटलाइजेशन के लिए बहुत जरूरी है| अगर गांव का सोचे तो वह अब तक कंप्यूटर और लैपटॉप खरीदने में असमर्थ है|सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम जनता को डिजिटल दुनिया के प्रति जागरूक करेगा|

* ई-हॉस्पिटल पोर्टल- इसके द्वारा जनता आसानी से डॉक्टर से कंसल्ट कर सकेगी| संकट के समय किसी भी रोग के रोगी के बारे में सभी जानकारी आसानी से पोर्टल के माध्यम से दी जाएगी|

*ई-बस्ता पोर्टल- इसमें छात्रों को पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएगी| इसका इस्तेमाल कोई भी कहीं भी कर सकता है | गवर्नमेंट द्वारा संचालित पोर्टल लॉन्च किए जाएंगे जिसमें नौकरियों की सभी महत्वपूर्ण जानकारियां इंटरनेट पर उपलब्ध कराई जाएगी |

*डिजिटल लॉकर- व्यक्ति अपने जरूरी दस्तावेज इसमें सुरक्षित रख सकते हैं | डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट के कारण सभी कार्यों में पारदर्शिता बढ़ेगी| इसके कारण रिश्वत जैसे कार्य कम हो जाएंगे|

*डीआईपी के कारण  सभी कार्य  आसानी से  बिना तकलीफ  के  घर बैठे हो जाएंगे |

*डीआईपी के कारण  देश में  रोजगार बढ़ेगा  तो  देश विकसित बन सकेगा| 

*डीआईपी के कारण लोगों का विकास कई गुना तेजी से बढ़ेगा |

डिजिटलाइजेशन से लोगों के प्रति कार्ड पेमेंट नेटबैंकिंग के प्रति नकारात्मक सोच कम होगी जिससे उनका प्रयोग बढ़ेगा और कालाबाजारी भी कम होगी साथ ही अर्थव्यवस्था में तेजी से विकास होगा|गांव को इस डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट में अहम रखने से इसकी नींव मजबूत होगी| जो कि बहुत जरूरी है क्योंकि शहरी लोग आसानी से स्मार्ट दुनिया को अपनाते हैं लेकिन सुविधा की कमी के कारण गांव के लोग पीछे रह जाते हैं | इस तरह डिजिटल इंडिया इवेंट मै रोज एक नई योजना लाई जाएगी|  जो जनता को इसका महत्व बताएगी | डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट  एक अच्छी शुरुआत है  जिससे देश का विकास एक्सप्लेनेशन ग्राफ की तरह होगा| लेकिन इसके लिए हमें इस तरह की व्यवस्थाओं से जुड़ना होगा | उन्हें सीखना होगा | डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट के तहत कई एडवांस टेक्नोलॉजी तेजी से देश में लाई जाएगी| जिसके लिए रिलायंस विप्रो एवं टाटा जैसी कंपनिया इन्वेस्ट करेगी| इन सभी दिग्गजों का मानना है  इससे देश का बहुत अधिक विकास होगा | रोजगार में वृद्धि होगी | साथ ही  पढ़ाई के लिए भी दूर दूर तक  भटकना नहीं पड़ेगा | भारत का नवनिर्माण का सपना  सच होता दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि देश में बहुत ही कम लोग डिजिटल दुनिया से जुड़े हैं  और यह बहुत बड़ी कमी है जिसके कारण  देश के विकास की गति कम है|

भुवनेश कुमावत
बी.ए. प्रथम वर्ष
परिष्कार कॉलेज ऑफ ग्लोबल एक्सीलेंस, जयपुर