भारत का एक बड़ा प्रभावी वर्ग आर्थिक विकास के नाम पर उदारीकरण और वैश्वीकरण का नारा बुलंद किए हुए है। उसका मानना है कि जब तक पर्याप्त पूंजी निवेश भारतीय क्षेत्र में नहीं होगा, चाहे वह विदेशी हो या देशी तब तक देश का आर्थिक विकास नहीं होगा। इसके लिए विदेशी कंपनियों को पर्याप्त सुविधाएं देनी होगी। उदार आर्थिक नीति ही हमें बचा सकती है। इसके विपरीत पिछले कुछ वर्षों से स्वदेशीकरण का नारा भी सुनाई पड़ने लगा है तथा यह विवाद चल गया है कि हमारा हित उदारीकरण में है या स्वदेशीकरण में? हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने गौरवशाली अतीत को भूल गए। अंग्रेजों के शासन से पूर्व भारत विश्व के धनी राष्ट्र में से एक था। यहां के उद्योग धंधे विकसित थे। दुनिया के अधिकांश राष्ट्रों से हमारे व्यापारिक संबंध थे। भारत वैभव एवं संपन्नता का केंद्र था, धीरे-धीरे यह संपनता विपन्नता में बदल गई। ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों के कारण हमारी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। हमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद का उपनिवेश बना दिया गया। यही के कच्चे माल से ब्रिटेन का औद्योगिक विकास हुआ और हमारा निरंतर शोषण होता रहा।
पश्चिमोन्मुखी आर्थिक नीतियों के कारण हमारा देश आर्थिक गुलामी की ओर धकेला जा रहा है। विदेशी ऋण भयावह स्थिति तक पहुंच गया है। विदेशी और आंतरिक ऋण का ब्याज चुकाने के लिए हमें कर्जा लेना पड़ रहा है। देश की आर्थिक स्थिति जर्जर होती जा रही है। बजट का चौथाई से भी अधिक भाग केवल ब्याज के भुगतान में जाएगा। इसका दुष्परिणाम यह है कि विदेशी ऋण देने वाले राष्ट्र या संस्थाओं की शर्तों को स्वीकार किया जा रहा है। रुपए का अवमूल्यन, सार्वजनिक उद्योगों का निजीकरण तथा विदेशी पूंजी को बढ़ाने की शर्तें भारत में विदेशी दबाव में स्वीकार की है। उदारीकरण की नीति इसी का परिणाम है। इसी के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को छूट दी जा रही है। भारत सरकार इन विदेशी कंपनियों को पलक पावडे बिछा कर न्यौता दे रही है। उनके आगमन से स्वदेशी उद्योग चौपट हो जाएंगे, भारतीय व्यवस्था ठप हो रही है एवं बेरोजगारी बढ़ रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारी बड़ी कंपनियों तक को निगल रही है। टाटा आयल, गोदरेज, पारले आदि इनके मुंह में समाते जा रहे हैं।
अतः हमें यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि पश्चिम के आत्मघाती विकास दर्शन और विदेशी शक्तियों के सहारे भारत के विकास की नई राह नहीं बनाई जा सकती। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत विकास के पश्चिमी मॉडल के भ्रम जाल से बाहर निकलकर स्वदेशी दर्शन पर आधारित अपने स्वयं के विकास के मार्ग को अपनाए। बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश की राष्ट्रीय अस्मिता पर चोट है। यह चेतना सबके मन में जगानी होगी तथा उनके उत्पादों का बहिष्कार करना होगा। जैसा हमने अंग्रेजों के शासन काल में महात्मा गांधी के नेतृत्व में किया था। हमें स्वदेशी का मंत्र पुनः जगाना होगा। विदेशी ऋण लेने की क्षमता पर प्रतिबंध लगाना होगा, तथा निर्यात बढ़ाने होंगे, आयात घटाने के स्वदेशी तंत्र के ज्ञान को विकसित करना होगा तथा विदेशी पूंजी के भारत में निवेश के प्रति सतर्कता बरतनी होगी। यदि हम शोषण मुक्त एवं स्वायत्त समाज का निर्माण करना चाहते हैं तो स्वदेशीकरण के विचार को प्रोत्साहन देना होगा। अंधानुकरण की दौड़ में शामिल होकर देश को विदेशी आर्थिक शक्तियों को सौंप देने से हमारी स्वतंत्रता किस प्रकार बनी रहेगी यह विचारणीय विषय है।
पंकज कुमार चंदेल
B.A. तृतीय वर्ष
परिष्कार कॉलेज जयपुर